Monday, February 20, 2017

देहरादून से वोट देने गांव पहुंचा रामगढ़ का सूरज


यह सपना केवल सूरज का नहीं, उत्तराखंड के विषम भौगोलिक स्थिति वाले हर पर्वतीय क्षेत्र के युवाओं की है। जो न चाहते हुए भी, मजबूरी में शिक्षा के लिए पलायन कर रहे हैं।


रामगढ़ ऐसी जगह, जो पर्यटन के लिए बेहद खूबसूरत। प्रसिद्ध सेब के बागान और रमणीक स्थल। मूलभूत सुविधाओं को लेकर फिर भी उपेक्षित। विधानसभा चुनाव-2017 के लिए मतदान की तिथि यानी 15 फरवरी। इस चुनाव से एक बार फिर युवाओं में बेहतरी की उम्मीद जगी। यही उम्मीद लेकर देहरादून से रामगढ़ पहुंचा सूरज सिंह नयाल।
 शीतला छतोला गांव निवासी सूरज की तमन्ना है, उसके क्षेत्र में अच्छे स्कूल-कॉलेज खुलें। इसी आस लिए वह हल्द्वानी से पांच वाहनों से लिफ्ट लेकर रामगढ़ के शीतला मतदान बूथ पर पहुंचा और अपने पसंदीदा प्रत्याशी को वोट दिया। यह सपना केवल सूरज का नहीं, उत्तराखंड के विषम भौगोलिक स्थिति वाले हर पर्वतीय क्षेत्र के युवाओं की है। जो न चाहते हुए भी, मजबूरी में शिक्षा के लिए पलायन कर रहे हैं। गढ़वाल विश्वविद्यालय से बीएससी कर चुके सूरज ने 10वीं तक की पढ़ाई मुक्तेश्वर के हाइस्कूल से की। वह तब की स्थिति बताते हैं, नौ किलोमीटर दूर पैदल स्कूल जाते थे। कक्षा में खाली बैठे रहते थे, लेकिन शिक्षक पढ़ाने नहीं आते थे। मुझे दुख होता है, इतने समय में बहुत कुछ नहीं सीख पाया, जो सीखना चाहिए था। माता-पिता, बहन सभी गांव में रहते हैं। मैं भी यही पढऩा चाहता हूं, लेकिन मजबूर होकर घर से निकल गया। 12वीं तक हल्द्वानी में पढ़ा और फिर देहरादून। मेरे तमाम साथी हैं, जो वोट देने आ रहे हैं। सूरज ने तमाम युवाओं को वोट के लिए प्रेरित किया।

Thursday, February 2, 2017

क्या हाल, बंद अस्पताल

मेरा सीधा सवाल...
उत्तराखंड बने 16 साल हो गए। पांच साल सत्ता में रहते हुए सीएम -सीएम खेलने वाली भाजपा ने अस्पतालों में मनमाने तरीके से तमाम उपकरण खरीद लिए। डॉक्टरों को पहाड़ के अस्पतालों में नहीं भेजा जा सका। ट्रांसफर में मनमानी से कई अच्छे डॉक्टरों ने इस्तीफा दे दिया।
कांग्रेस की इस सरकार में स्वास्थ्य विभाग जितना अधिक गर्त में गया। शायद सोच भी नहीं सकते। कैसे डॉक्टरों के ट्रांसफर में खेल चला। एनएचएम योजना का हश्र यह है कि सूचना के अधिकार के तहत भी योजना के क्रियान्वयन की भी जानकारी नहीं दी जा रही है। अस्पतालों में निर्माण कार्य के नाम पर नैनीताल जिले के एक ठेकेदार को मनमाने तरीके ठेका दे दिया गया। सीडीओ की जाँच में गबड़झाला उजागर हो गया लेकिन इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी, ठेकेदार के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। आखिर ऐसा क्यों...?
इसके पीछे जनहित मंशा रही होगी या फिर कुछ और...यह आप भली-भांति समझ सकते हैं।

Thursday, January 22, 2015

मां तेरी 'कशिश' अब नहीं रही...

दिल से...


                 मां तेरे नयनों की ज्योति थी। पलकों में पली थी। सांसों में बसी थी। घर के आंगन की चहकती चिडिय़ा थी। खूब इठलाती थी। मचलती थी। दुलारी थी। सबको खुशियां देती थी। मां तूने खूब सारा प्यार मुझ पर उड़ेला था। नौ माह गर्भ में पाला-पोषा और अब मेरे हर कदम को आगे बढ़ाने के लिए सहारा दे रही थी। मेरी छोटी सी तकलीफ पर तू सहम सी जाती थी। और पापा...। भैया...।
खूबसूरत संसार में मैं भी जी रही थी। मेरे भी सपने थे। कुछ ख्वाहिशें थी। कुछ पाने की हसरतें थी। मां-बाप के प्यार को परवान चढ़ाने की इच्छा थी। मैं भी तो 'अपनों' के बीच खिलखिला रही थी। मस्त थी। उल्लास के इस माहौल में सभी मदमस्त थे। हो भी क्यूं न, आखिर मामा जी की शादी जो थी। समारोह में मैं भी उछल-कूद मचा रही थी। गीत-संगीत में झूम रही थी। इधर-उधर भाग रही थी। पापा-मम्मी, बुआ-फूफा, ताऊ-ताई, चचेरे, फुफेरे, ममेरे भाई-बहन सभी जो एक साथ थे। खुशी के उत्सव का ऐसा सुनहरा मौका बार-बार कहां मिलता था। शादी के बाद प्रीतिभोज पर मामा-मामी को बधाई देने का सिलसिला चल रहा था। शायद बालमन से ही मैं भी अपने विवाह के बारे सोच रही होंगी। मेरे मां-बाप अपने हाथों से मेरा भी कन्यादान करते। मैं भी कितना खुशनसीब होती। मेरे चाहने वाले भी मेरे समारोह में होते। मेरा भी घर बसता। अपना संसार होता...। पता नहीं..., मेरी मासूमियत पर किस दरिंदे की नजर लग गई थी। उसके बाद...? सब खामोश। मां तेरे हाथों से मेरी नन्हीं अंगुली हमेशा के लिए छूट चुकी थी। तेरी ममता का, तेरी लाडली कशिश का बेरहमी से कत्ल हो चुका था। पुलिस अंकल बहुत देर हो चुकी थी... अब चाहें तो आप...? मेरी मौत से सवाल तो बहुत उठेंगे, पर... जवाब...?

रोशनी की चकाचौंध में गम नहीं छुपा करते



हमारी आधी जिंदगी कट चुकी है। आगे भी ऐसे ही अंधकार में बीत जाएगी। हम बच्चों के भविष्य को लेकर दुविधा में हैं।

      
       अमावस्या की काली रात को जहां चारों ओर जगमग रोशनी की चकाचौंध होगी। उल्लास व उमंग का वातावरण होगा। एक दूसरे को उपहार देते हुए बधाई का सिलसिला चलता रहेगा। ऐसे समय में हल्द्वानी के राजपुरा में परिवार व समाज से उपेक्षित जीवन व्यतीत करने वाले कुष्ठ रोगियों के बच्चे पिता की भीख से मिले पैसे का इंतजार कर रहे होंगे। अंधकार को दूर कर प्रकाश फैलाने का संदेश देते पर्व पर ऐसे बच्चे स्वयं के भविष्य में उजास की उम्मीद में टकटकी लगाए रहेंगे। इस रोशनी में ऐसे बच्चों का गम नहीं छुप सकता है।
दीपावली के पहले दिन नरक चतुर्दशी को जब राजपुरा स्थित 25 परिवारों वाले कुष्ठ आश्रम पहुंचे तो बच्चों से लेकर बूढ़ों तक की निगाहें कुछ पाने की लालसा में थी। हर कोई सिर हिलाकर अभिवादन कर रहा था। इस आश्रम में शून्य से 18 वर्ष तक के 50 बच्चे, किशोर व युवा रहते हैं। इनमें से कुछेक देहरादून के मिशन स्कूल में पढ़ते हैं तो कुछेक शहर के आसपास स्कूलों में जाते हैं। इनकी फीस मां-बाप की भीख पर निर्भर है। काम करने में असमर्थ कुष्ठ रोगी भी मजबूर होकर अपराध की श्रेणी में शामिल भीख मांगने को विवश हैं। दीपावली को लेकर कोई रौनक नहीं थी। इन बच्चों को कुछेक लोगों से उम्मीद लगी रहती है कि वे पटाखे, फुलझडिय़ां और खिल-खिलौने दे जाएं। प्रतिमाह बिजली का बिल देने में ही असमर्थ ये लोग झालर नहीं लगा सकते हैं। कुष्ठ आश्रम राजपुरा के अध्यक्ष सुमन पाठक कहना था, हमें अपनी चिंता नहीं है। हमारी आधी जिंदगी कट चुकी है। आगे भी ऐसे ही अंधकार में बीत जाएगी। हम बच्चों के भविष्य को लेकर दुविधा में हैं। कुछेक बच्चों ने जैसे-तैसे बीएससी, एनएनएम, जीएनएम, मर्चेंट नेवी का प्रशिक्षण प्राप्त किया। अब यह बच्चे नौकरी के लिए भटक रहे हैं। हमारी दीपावली तभी होगी, जब हमारा भीख मांगना बंद होगा। बच्चों का भविष्य उज्जवल होगा। इस दिन घर के मंदिर में देवी लक्ष्मी से बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं। निकट के ही स्कूल में आठवीं में पढऩे वाले माइकल का कहना था, हम लोग भी चाहते हैं कि नए कपड़े पहनें। घर दीयों की रोशनी से जगमगा उठे। पर मजबूर हैं। इसी तरह अन्य बच्चे जेसिका, रोहित, काव्या, रोशन, गोमती की भी यही उम्मीद है, लेकिन मां-बाप की भीख में यह सब संभव नहीं।

Thursday, July 3, 2014

साल भर बाद भी सरकार की वही खामोशी



भीषण हादसा, जिसे याद कर रूह तक कांप जाती है। सिहरन हो जाती है। मातम छा जाता है। घाव फिर से दर्द करने लगते हैं। पांवों तले जमीन खिसकने की कहावत आंखों के सामने फिर से हकीकत में तैरने लगती है। भयानक हादसा था, ऐसा कि एक साल बीत जाने के बाद भी इन जख्मों पर मरहम लगाने तक को राज्य सरकार को सुध तक नहीं आई। पिथौरागढ़ जनपद का वह सीमांत हिस्सा जो आपदा के रौद्र रूप से तहस-नहस हो गया था, वहां आज भी जनजीवन सामान्य नहीं हो सका है।
राज्य में मुख्यमंत्री तो बदले लेकिन पुनर्वास की व्यवस्था को हाथ आगे नहीं बढ़े। पीडि़तों के जख्मों पर मरहम-पट्टी भी ठीक से नहीं की जा सकी। इसके लिए भी प्रदेश की अस्थायी राजधानी से लेकर देश की राजधानी से घडिय़ाली आंसू बहाने वाले और हवाई दावे करने वाले हुक्मरानों को हकीकत का अंदाजा आज तक नहीं हो सका। मुनस्यारी व धारचूला ब्लाक के 600 से अधिक बेघर लोग अस्थायी व्यवस्था के तहत जैसे-तैसे दिन व्यतीत कर रहे हैं। आपदा के कुछ समय बाद तक यहां पर स्वास्थ्य निदेशक ने दौरा किया। सामाजिक संस्थाओं ने दवाइयां भेजीं, इन दवाइयों का वितरण भी ठीक से नहीं हो सका था। धारचूला क्षेत्र के 60 से अधिक प्रभावित आबादी को केवल नगर क्षेत्र में पांच डाक्टर हैं। अस्पताल में संसाधन के नाम पर व्यवस्था शून्य है। अगर किसी को जांच करानी है तो या दुर्गम रास्तों से जान जोखिम में डालते हुए जिला कार्यालय या फिर हल्द्वानी पहुंचना होता है। यहां पहुंचने तक मरीज की बीमारी कई गुना और बढ़ जाती है। यही हाल मुनस्यारी क्षेत्र का है। मुनस्यारी से सीमांत गांव तक 66 किलोमीटर के दायरे में सैकड़ों गांव में 40 हजार से अधिक की आबादी निवास करती है। केवल मुनस्यारी में चंद डाक्टरों की बदौलत पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था निर्भर है। स्वास्थ्य सेवा की जरुरत वैसे तो सभी को है लेकिन उन लोगों को और अधिक जरुरत पड़ जाती है, जो कुदरत के मार से त्रस्त हैं। एक साल बीत गया। बदहाल स्वास्थ्य सेवा को देखने वाला कोई नहीं है। यही हाल बागेश्वर व चंपावत जिले के आपदाग्रस्त क्षेत्र का है। यहां के लोग सरकारी व्यवस्था के नाम पर वोट देने तक सीमित रह गए हैं। स्वास्थ्य महानिदेशक डा. गौरीशंकर जोशी कहते हैं कि हम मानते हैं कि हमारे पास डाक्टरों की कमी है। हम पूरी तरह स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं। आने वाले समय में तमाम कोशिश होगी कि इन्हें बेहतर उपचार की सुविधा मिल सके।