Sunday, October 9, 2011

कोई पार नदी के गाता



भंग निशा की नीरवता कर
इस देहाती गाने का स्‍वर
ककड़ी के खेतों से उठकर,
आता जमुना पर लहराता
कोई पार नदी के गाता।

होंगे भाई-बंधु निकट ही
कभी सोचते होंगे यह भी
इस तट पर भी बैठा कोई, 
उसकी तानों से सुख पाता
कोई पार नदी के गाता।

आज न जाने क्‍यों‍ होता मन
सुनकर यह एकाकी गायन
सदा इसे मैं सुनता रहता, 
सदा इसे मैं गाता जाता
कोई पार नदी के गाता। 

-  हरिवंश राय बच्‍चन 

3 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति, आभार .


    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारें.

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  2. pichlee kuch post bahut hee sundar hain.....keep writing ...keep posting

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Thanks