Friday, December 9, 2011

न जाने और क्या क्या...फिर

  
        एक सामान्य लड़का, बेटा, भाई, भतीजा, पत्रकार, जीवन के गूड रहस्यौ के बारे मे सोचने वाला, समाज के भाति-भाति चेहरो को पढ़ने की कोशिश करने वाला, चिंतन करने वाला, न जाने और क्या क्या...फिर भी..जीवन मे खालीपन...अधूरापन...सुकून की तलाश, शांति को भटकता मन, विचारो के अंतर्द्वंद से मुक्ति की छटपटाहट...आखिर क्या खोजते रहता होगा इंसान और किसलिए...  कब तक, कहा तक, किस मंजिल तक, चलते रहना है, दोड़ते रहना है, आखिर किस पड़ाव तक पहुचने के लिए, कभी हम इस तरह के विचारो को समझने की कोशिश करते है.
हम भी गज़ब के इंसान होते है, कई बार लगता है, जो हम कर रहे है, यह ठीक है या गलत। फिर सोचने लगते है, सही या गलत का निर्धारण करने वाले हम कोन हो सकते है। जिस प्रकृति की यह संरचना है, उसने हमे कुछ तो बताया नहीं। फिर भी हम वो करते है, जिसमे हम संतुष्ट होते है।  तब हम सारे नियमो को क्यू भूल जाते है। हमारे पास उस प्रश्न का जवाब नहीं होता है। नियम क्या है और इन्हे किसने बनाया, ज्यादा पचड़े मे पड़ने के बजाय, फिर हम आगे चलने लगते है, तुरंत विचार आता है, आज तो कर लेते है, बाकी कल देखेंगे। इसके बाद कल का कोई अर्थ नहीं रह जाता है, जब हम आज ही वह कर लेते है, जो हमे करना होता है। कभी-कभार हम येसी बहसो मे भी कूद जाते है, जिसके विपरीत हम काम कर रहे होते है। यह विषय बहुत बड़ा है, जितना सोचो उतना कम...।
फिर आपसे मिलते रहेगे...

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