Saturday, June 8, 2013

विसंगतियों से निकले हकीकत का भारत


  गणेश जोशी

   "यदि राजशक्ति के केन्द्र में अन्याय होगा, तब तो सारा राष्ट अन्याय के खेल का मैदान ही बन जाएगा।" जयशंकर प्रसाद का कहा हुआ यह कथन आज की केन्द्र व राज्य सरकारों के लिए सटीक बैठती है। भ्रष्टाचार की बात करते-करते हम सभी थक गए और यह शब्द सुनते-सुनते पक गए। कथित बुद्धिजीवियों ने तो इसे शिष्टाचार मान लिया है। खैर, जो भी हो जिस तरह का तंत्र भारत में विकसित हो रहा है, यह देशहित में नहीं नजर आ रहा है। कांग्रेस को सत्ता में बने रहने का भले ही बेहतर अनुभव हो लेकिन देशहित के लिए किए जा रहे कार्यों को लेकर अभी तक परिपक्वता नहीं दिखती। अगर परिपक्वता होती तो हमारे देश में अभी तक कुपोषण, भुखमरी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, निरक्षरता, गरीबी, माफियाराज, गुंडागर्दी, माओवाद, नक्सलवाद, आतंकवाद व देश व विदेश में जमा कालाधन जैसे मामले इतने बडे स्तर पर नहीं होते। इतने समय तक अगर हमारे देश में तमाम समस्याएं विकराल रूप धारण कर रही हैं तो इसका दोष हम किसे दें, कौन इसके लिए जिम्मेदार है, अब किसे आगे आना होगा। अन्ना हजारे की हुंकार व अरविंद केजरीवाल के आंदोलन से हम कुछ करेंगे या फिर यह मामले भी इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएंगे। हमारे शीर्ष स्तर से ही अन्याय का ख्ेाल खेला जा रहा है तो हम नीचे बेहतरी की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के लिखे कोटेशन "हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा" हर जगह दिख जाता है। फिर भी हम भारत के नागरिक होने के नाते एक ऐसे भारत देश का सपना संजोते रहते हैं, जहा शांति हो, हर व्यक्ति रोजगार से जुडा हो, विविधता में एकता के नारे को हकीकत में साकार होता दिख रहे हों। आपसी प्रेम, भाइचारे की बात को धार्मिंक ग्रंथों की पन्नों से बाहर समाज में देख रहे हों, एकता, अखंडता, संप्रभुता, मौलिक अधिकार व कर्तव्यों की बातें भी संविधान की धाराओं तक सीमित न होकर भारत में रामराज्य के सपने को साकार करता दिख रहा हो, तो हम फिर से विश्व गुरू, सोने की चिडिया, विकसित राष्ट आदि कहलाने के योग्य व हकदार हो जाएंगे।

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